तुम नहीं हो
सिर्फ शब्द हैं तुम्हारे
अहसास उन पलों के
जो साथ कुछ गुजारे
शब्द जुड़ बन जाएंगे
यादों की चादर
जिसे ओढ़ कविता बन
आ खड़ी होगी तुम
इस कविता के हर शब्द में
हर स्वर में
छुपी होगी हंसी
तुम्हारी
महक होगी इसमें
पाने और खोने के
अनुभवों की
स्वरों का विस्तार होगा
निरंतर बढ़ती दूरी का
आलाप होगा
बिछोह की मर्मांतक पीड़ा का
कविता के अक्षर गूंजेंगे
स्मृति पटल पर
चुम्हारे उदास चेहरे की पीड़ा बन
कब तक लिखूं यह
कभी न खत्म होने वाली
कविता
रोज़ -ब- रोज़
हिंदी कविता
शुक्रवार, जुलाई 23, 2010
बुधवार, जुलाई 21, 2010
किस्मत
सुबह सूरज
साया बनेगा
क्या कभी
चांद शाम ढलने के साथ
बरसाने लगेगा प्रचंडता
शायद कभी नहीं
सच है
किस्मत में सबके
सब कुछ नहीं
साया बनेगा
क्या कभी
चांद शाम ढलने के साथ
बरसाने लगेगा प्रचंडता
शायद कभी नहीं
सच है
किस्मत में सबके
सब कुछ नहीं
गुरुवार, जुलाई 15, 2010
कोंपल
मासूम खिलखिलाहट
नन्ही सी खिलखिलाहट
आहट
मुस्कुराते कल की आहट
मुखड़ा
नहीं दुखड़ा दमकता मुखड़ा
सुबह
सूरज की रोशनी पर सवार सुबह
तरंग
आकाश में फैले रंगों की तरंग
मासूम खिलखिलाहट
नन्ही सी खिलखिलाहट
रैना
गोदी में अम्मा के सोती रैना
सपने
सुरों से सजे उमड़ते-घुमड़ते सपने
कारवां
मिट्टी में सने सब एक से दोस्तों का कारवां
रास्ता
मंजिल की फिक्र किए बगैर भागता रास्ता
मासूम खिलखिलाहट
नन्ही सी खिलखिलाहट
पानी
निष्छल नदियों में कलकल पानी
हवा
आवारा बादलों को साथ ले घूमती हवा
सितारे
अमावस को रोशन करने दमकते सितारे
धरती
रंग-बिरंगे फूलों से महकती धरती
मासूम खिलखिलाहट
नन्ही सी खिलखिलाहट
नन्ही सी खिलखिलाहट
आहट
मुस्कुराते कल की आहट
मुखड़ा
नहीं दुखड़ा दमकता मुखड़ा
सुबह
सूरज की रोशनी पर सवार सुबह
तरंग
आकाश में फैले रंगों की तरंग
मासूम खिलखिलाहट
नन्ही सी खिलखिलाहट
रैना
गोदी में अम्मा के सोती रैना
सपने
सुरों से सजे उमड़ते-घुमड़ते सपने
कारवां
मिट्टी में सने सब एक से दोस्तों का कारवां
रास्ता
मंजिल की फिक्र किए बगैर भागता रास्ता
मासूम खिलखिलाहट
नन्ही सी खिलखिलाहट
पानी
निष्छल नदियों में कलकल पानी
हवा
आवारा बादलों को साथ ले घूमती हवा
सितारे
अमावस को रोशन करने दमकते सितारे
धरती
रंग-बिरंगे फूलों से महकती धरती
मासूम खिलखिलाहट
नन्ही सी खिलखिलाहट
शनिवार, जुलाई 03, 2010
पगडंडी
सडक़ छोड़
कई बार
उतर आता हूं
पगडंडियों पर
कोलतार की सडक़ सी
चिकनी नहीं होती पगडंडी
ऊबड़-खाबड़
कांटे भी चुभ जाते हैं
पगडंडियों पर
किन्तु प्रवाहित है जीवन
पगडंडियों पर
हरी घांस सडक़ पर नहीं
पगडंडियों पर ही
ले सकती है सांस
कई बार
उतर आता हूं
पगडंडियों पर
कोलतार की सडक़ सी
चिकनी नहीं होती पगडंडी
ऊबड़-खाबड़
कांटे भी चुभ जाते हैं
पगडंडियों पर
किन्तु प्रवाहित है जीवन
पगडंडियों पर
हरी घांस सडक़ पर नहीं
पगडंडियों पर ही
ले सकती है सांस
शुक्रवार, जुलाई 02, 2010
स्वर्ग
दूर पहाड़ पर खड़े हो
तराई में फैली हरियाली को
नीले फैले आसमान को
देखिए
कहीं दूर जंगल में से आती
याकि सागर की ऊंची लहरों से
छनकर आती
ठंडी बयार को
महसूस कीजिए भीतर तक
डूबते सूरज को
और पानी में उसके प्रतिबिंब को
विदा कीजिए
स्वागत कीजिए अंधकार में
आंखें खोलते चांद का
स्वर्ग ढूंढना नहीं होता
होता है स्वर्ग
हर पल धरती पर
तराई में फैली हरियाली को
नीले फैले आसमान को
देखिए
कहीं दूर जंगल में से आती
याकि सागर की ऊंची लहरों से
छनकर आती
ठंडी बयार को
महसूस कीजिए भीतर तक
डूबते सूरज को
और पानी में उसके प्रतिबिंब को
विदा कीजिए
स्वागत कीजिए अंधकार में
आंखें खोलते चांद का
स्वर्ग ढूंढना नहीं होता
होता है स्वर्ग
हर पल धरती पर
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