रोज़ -ब- रोज़
हिंदी कविता
शनिवार, जुलाई 03, 2010
पगडंडी
सडक़ छोड़
कई बार
उतर आता हूं
पगडंडियों पर
कोलतार की सडक़ सी
चिकनी नहीं होती पगडंडी
ऊबड़-खाबड़
कांटे भी चुभ जाते हैं
पगडंडियों पर
किन्तु प्रवाहित है जीवन
पगडंडियों पर
हरी घांस सडक़ पर नहीं
पगडंडियों पर ही
ले सकती है सांस
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