शुक्रवार, जुलाई 23, 2010

तुम

तुम नहीं हो
सिर्फ शब्द हैं तुम्हारे
अहसास उन पलों के
जो साथ कुछ गुजारे
शब्द जुड़ बन जाएंगे
यादों की चादर
जिसे ओढ़ कविता बन
आ खड़ी होगी तुम
इस कविता के हर शब्द में
हर स्वर में
छुपी होगी हंसी
तुम्हारी
महक होगी इसमें
पाने और खोने के
अनुभवों की
स्वरों का विस्तार होगा
निरंतर बढ़ती दूरी का
आलाप होगा
बिछोह की मर्मांतक पीड़ा का
कविता के अक्षर गूंजेंगे
स्मृति पटल पर
चुम्हारे उदास चेहरे की पीड़ा बन
कब तक लिखूं यह
कभी न खत्म होने वाली
कविता

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